Monday, February 12, 2018

फासला रखना हमेशा अच्छे हों जितने ये लोग


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फासला रखना हमेशा अच्छे हों जितने ये लोग,
होती मीठी सी ज़ुबाँ अंदर से ज़हरीले ये लोग ।
मुस्कुराते रहते हैं ये......फूल कांटों संग भी,
ये हुनर सिखला दे कोई क्यूँ हैं पथरीले ये लोग ।

-----------------हर्ष महाजन

ख़्वाबों का सिलसिला क्या बताऊँ ऐ 'हर्ष,



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ख़्वाबों का सिलसिला क्या बताऊँ ऐ 'हर्ष,
हालात-ए-इश्क से बे-खबर लगता है शायद तू |

_______हर्ष महाजन

यूँ ही मुहब्बत में बर्बाद होना किसे अच्छा लगता है


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यूँ ही मुहब्बत में बर्बाद होना किसे अच्छा लगता है,
मगर हौंसिले बुलंद हों तो हर ज़ख्म सुहाना लगता है |

_______________________हर्ष महाजन

इतना भी तो आसां नहीं किसी शेर को कह पाना


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इतना भी तो आसां नहीं किसी शेर को कह पाना,
इक-इक लफ्ज़ मुहब्बत हार कर पिरोना पड़ता है |

___________________हर्ष महाजन

कुछ दर्याफ़्त करना भी अब गुनाह सा लगता है,


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कुछ दर्याफ़्त करना भी अब गुनाह सा लगता है,
भुला दो तुम भी वो लम्हें यही वफ़ा सा लगता है |

___________________हर्ष महाजन

Monday, November 13, 2017

ये लफ्ज़ मेरे, सोच मेरी, नग्में भी मेरे,

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ये लफ्ज़ मेरे, सोच मेरी, नग्में भी मेरे,
अब जाने क्यूं ख्याल सभी उनमें हैं तेरे  ।
ये शाम भी हँसी-हँसी है वक़्त में वफा,
फ़िर जाने तेरी यादों में आँसू है क्यूँ मेंरे ।

--------------------हर्ष महाजन

221 2121 1221 212

Saturday, November 11, 2017

चलो आज उन्हें बता कर देखते हैं

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चलो आज उन्हें बता कर देखते हैं,
तसव्वुर दिल के जता कर देखते हैं ।
बहुत खेल ली खुद से आंख मिचौली,
चलो आज उन्हें मना कर देखते हैं ।

-------------हर्ष महाजन

Wednesday, August 23, 2017

मेरे किस्से मेरी दुनिया भी कोई जाना नहीं


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मेरे किस्से मेरी दुनिया भी कोई जाना नहीं,
दर्द कितना मेरे दिल में था कोई माना नहीं |
साथ रहते थे..........तसव्वुर का पता देते थे,
पहले दीवाने बहुत... अब कोई दीवाना नहीं |

____________हर्ष महाजन

Thursday, August 3, 2017

अश्कों की दास्तां है, यूँ ही दर्ज हुआ करती है ऐ 'हर्ष',

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अश्कों की दास्तां है, यूँ ही दर्ज हुआ करती है ऐ 'हर्ष',
वरना अहसासों से उठे सैलाब ज़िन्दगी को तोड़ देते हैं ।...

--------------------–हर्ष महाजन

ज़ख्म दर ज़ख्म अपने अहसास इन शेरों में प्रवेश करता हूँ

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ज़ख्म दर ज़ख्म अपने अहसास इन शेरों में प्रवेश करता हूँ
बस दिल के कुछ टुकड़े हैं जो रोज़ किश्तों में पेश करता हूँ ।

_______________________हर्ष महाजन ।

Thursday, July 20, 2017

इतनी उम्मस है फलक को तू हिलाने वाले

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इतनी उम्मस है फलक को तू हिलाने वाले,
ये घटा बरसेगी कब....दुनियाँ चलाने वाले ।

---------------------हर्ष महाजन

Tuesday, July 18, 2017

ये तोपें हिन्द की गर खुल गईं दुश्मन का क्या होगा,

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ये तोपें हिन्द की गर खुल गईं दुश्मन का क्या होगा,
मिटेगा हर निशाँ दुनियाँ के नक्शे से बयाँ होगा ।

जो घाटी से मुहब्बत की दुहाई दे रहे दुश्मन,
उठेंगी अर्थियां इक-इक डगर दुश्मन फनां होगा ।

अरुणाचल डोकलम की मार्फत गर छेड़ दिया हिन्द को,
तो बीजिंग से शिंगाई तक यहां हिन्दोस्तां होगा ।

ये बासठ का नहीं है हिन्द मिसाइलों से हुआ जालिम,
यहां गर आंख भी फड़की धुआं जाने कहाँ होगा ।

बहुत हो गए पटाखे सरहदों पे खत्म हुई सरगम,
यूँ ले अंगड़ाई बदला हिन्द यहां फिर से जवाँ होगा ।

अभी है वक़्त संभल जाओ चेताता 'हर्ष' तुम्हें वरना,
यहां कुछ देशों का जग में नहीं नामों निशाँ होगा ।

--------------------हर्ष महाजन

Saturday, July 15, 2017

तेरे इश्क में गर है जुनूं, मेरी इल्तजा कि खुदा से कर

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तेरे इश्क में गर है जुनूं, मेरी इल्तजा कि खुदा से कर,
तेरा बेवफाई का मन करे तो है ये दुआ तू अदा से कर |

तुझे ज़िंदगी की किताब का कोई हर सफा क्यूँ सौंप दे,
जो हिफाज्तें तू न कर सका उनको खुदा की दुआ से कर |

---------------हर्ष महाजन

Monday, May 29, 2017

जब आँखों ही आँखों में, मिलते जवाब



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जब आँखों ही आँखों में, मिलते जवाब,
कह दूँ कैसे नहीं होती उनसे मुलाक़ात |
लोग कहते हैं मुझसे...खफा वो जनाब,
उठता फिर भी नहीं मेरे लब पे सवाल |

हर्ष महाजन

Thursday, February 9, 2017

क्षणिका क्या है ?



“क्षण की अनुभूति को चुटीले शब्दों में पिरोकर परोसना ही क्षणिका होती है।"

अर्थात् मन में उपजे एक क्षण के गहन भाव को अपने कम से कम शब्दों में कैद करना  ।

Wednesday, February 8, 2017

दूरियां

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दूरियां बढाने से
दिलों में,
प्यार बढ़ता है ।
मगर
दूरियां !! इतनी भी न हों जाएँ
कि वो
भूल ही जाए ।

-- हर्ष महाजन

क्षणिका (ऐ दिल)

क्षणिका
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ऐ दिल !
धड़को !!
खूब धड़को !!!
मगर ----
इतना नहीं ?
कि अपनी
पराकाष्ठा ही भूल जाए ।

--हर्ष महाजन

पराकाष्ठा = चरम सीमा

Saturday, January 7, 2017

कितने फख्र से लिखा उसने....(क्षणिका)


कितने फख्र से लिखा उसने....

100 साल पुरानी
पड़्पूंझे की दूकान ।

अपनी तरक्की
दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर गया वो ।

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हर्ष महाजन

Sunday, January 1, 2017

आँखों के समंदर में जो ख़्वाबों की है कश्ती

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आँखों के समंदर में जो ख़्वाबों की है कश्ती
ले जाए न भर-भर के वो अरमानों की बस्ती ।
अफ़साने जो दिल में हैं न अश्क़ों को ले जाएँ
ये सोच के बचपन की तड़प भूले वो मस्ती ।

--------------हर्ष महाजन

221 1221 1221 112

Sunday, December 25, 2016

ग़लतफहमी इतनी कि वफाओं में भी गम निकले

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ग़लतफहमी इतनी कि वफाओं में भी गम निकले,
तूफ़ां उठा ऐसा कि पुराने खत भी सभी नम निकले ।

हर्ष महाजन