Thursday, February 9, 2017

क्षणिका क्या है ?



“क्षण की अनुभूति को चुटीले शब्दों में पिरोकर परोसना ही क्षणिका होती है।"

अर्थात् मन में उपजे एक क्षण के गहन भाव को अपने कम से कम शब्दों में कैद करना  ।

Wednesday, February 8, 2017

दूरियां

...

दूरियां बढाने से
दिलों में,
प्यार बढ़ता है ।
मगर
दूरियां !! इतनी भी न हों जाएँ
कि वो
भूल ही जाए ।

-- हर्ष महाजन

क्षणिका (ऐ दिल)

क्षणिका
*******

ऐ दिल !
धड़को !!
खूब धड़को !!!
मगर ----
इतना नहीं ?
कि अपनी
पराकाष्ठा ही भूल जाए ।

--हर्ष महाजन

पराकाष्ठा = चरम सीमा

Saturday, January 7, 2017

कितने फख्र से लिखा उसने....(क्षणिका)


कितने फख्र से लिखा उसने....

100 साल पुरानी
पड़्पूंझे की दूकान ।

अपनी तरक्की
दो लफ़्ज़ों में बयाँ कर गया वो ।

***

हर्ष महाजन

Sunday, January 1, 2017

आँखों के समंदर में जो ख़्वाबों की है कश्ती

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आँखों के समंदर में जो ख़्वाबों की है कश्ती
ले जाए न भर-भर के वो अरमानों की बस्ती ।
अफ़साने जो दिल में हैं न अश्क़ों को ले जाएँ
ये सोच के बचपन की तड़प भूले वो मस्ती ।

--------------हर्ष महाजन

221 1221 1221 112

Sunday, December 25, 2016

ग़लतफहमी इतनी कि वफाओं में भी गम निकले

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ग़लतफहमी इतनी कि वफाओं में भी गम निकले,
तूफ़ां उठा ऐसा कि पुराने खत भी सभी नम निकले ।

हर्ष महाजन

ये कैसा दौर चल निकला

...

रिश्तों में
अब अहसासों का,
ये कैसा दौर चल निकला,
किसी ने.......
संवारने में ज़िन्दगी लगा दी,
कहीं पिटारी में...
नफरतों का बम निकला ।


------हर्ष महाजन

Monday, December 19, 2016

कितनी दफा

...

कितनी दफा,
__अर्ज़ी लगायी है
उसके दरबार में,
__लगता है ! असर नहीं आया,
हमारी दुआओं में अभी ।


___हर्ष महाजन

भूला नहीं हूँ (पापा की पाती )

भूला नहीं हूँ

*********

उद्विग्न हूँ, लाचार हूँ ।
क्या कहूँ,
धरा पे खड़ा,
मगर
बेकार हूँ ।
सुबह का वक़्त ,
जाने कितनी रेलगाड़ियां
पटरी पर गुजर गयीं ,
बरबस ही,
बहुत सी यादें,
दिलो दिमाग में उभर गयीं ।
भूला नहीं हूँ----


अध्यापिका की भांति,
तेरा....दीवारों पे लिखना,
घंटो,.....अकेले,
लक्कड़ की बनी,
अलमारी पर,
खयालों को,
चाक से उकेरना ।
भूला नहीं हूँ......

कहाँ है वो लम्हें ,
एक छोटी छड़ी,
फिर तेरा
ख्याली बच्चों को डाटना ।
अक्सर
आफिस जाती मम्मी से,
उसकी साड़ी का माँगना,
स्कूल से आकर,
फिर उसे घंटो...
बदन पर लपेटना ।
लंबी टांगो वाली
अपनी बार्बी से खेलना
भूला नहीं हूँ......

आज
"फ्रूट खत्म हो गया मम्मी"
अक्सर ! मां को दफ्तर
फोन करना ।
मम्मी सेब ले आना,
अमरुद और केला भी ।
भूला नहीं हूँ ........

शायद ,
मैं खुद सफर पे हूँ,
क्या कहूँ.. अधर में हूँ,
बूढ़ा गया हूँ,
बोरा गया हूँ ।
सोचा था,
कुछ नहीं बताऊंगा,
मगर दर्द इतना है,
सह नहीं पाऊंगा ।
वो फीका जश्न
और
तेरी आँखों में
अन सुलझे प्रश्न
भूला नहीं हूँ.....

लौट आओ,
अन-जन्मे सवालों से,
उन ज्वलित ख्यालों से,
लौट आओ---बेटा--लौट आओ ।

----हर्ष महाजन

Monday, December 12, 2016

काले धन की क्या है कीमत.....रखते जो शौचालयों में

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काले धन की क्या है कीमत.....रखते जो शौचालयों में,
समझे थे धनवान मगर क्या सीख लिया विधालयों में |
नज़र पड़ी जब मोदी की तो.......कीमत पड़ गयी भारी,
दो और दो जो चार करे थे........रह गये सब ख्यालों में |

हर्ष महाजन

काला-धन



काला-धन
धूम मची है गलियारों में संसद ने क्या अब ठानी है,
शोर मचा नोट-बंदी पे ज्यूँ अपनी बात मनवानी है |
काले धन के हितकारी जब उठ-उठ तंज बदलने लगे,
अपनी कला दिखा मोदी जी इक-इक ‘पर’ कुचलने लगे |


क्लेशी बोल रहा दिल्ली में, लो वापिस, मोदी खंज़र को,
कलकत्ता, यू० पी० भी गुर्राया, पप्पू संग, इस मंज़र को |
काले-धन के रखवाले अब, आतंक की भाषा बोल रहे,
शोर मचा दो संसद में मत, बोलन दो, इस धुरंधर को |

बहुत हुई अब छीना झपटी सारे पासे उलट गये,
काले धन के बोरे गुप-चुप नालों में सब पलट गये |
ख़बरों में सब देख नाम अब जनता भी आवाक हुई,
शक-शुभा ज़हन में था जो पल में सब वो सुलट गये |

बैंको ने जब दिया साथ तो, मीडिया क्यूँ परेशान हुई ,
हुए बुनियादी किस्से कुछ, पूरी बैंकिंग क्यूँ बदनाम हुई |
हर वर्कर, हर-हर मोदी कर जब, रात-दिन था, जुटा रहा,
जी०टी०वी०, क्या बिगाड़ा इनकी, मेहनत क्यूँ बेदाम हुई |


हर्ष महाजन

Wednesday, August 31, 2016

लोग जाने शहर में किस तरह जी रहे हैं

एक मुक्तक

...
लोग जाने शहर में....किस तरह जी रहे हैं,
इन हवाओं में शामिल ज़हर तक पी रहे हैं |
गाँव जब से उठे हैं....शहर की चाल लेकर,
तब से चादर ग़मों की....शहरिये सी रहे हैं |
हर्ष महाजन 'हर्ष'

Friday, August 19, 2016

भरे काँटों में खिलते फूलों को भी तोड़ना सीखा


भरे काँटों में खिलते फूलों को भी तोड़ना सीखा,
है भैया का ये रिश्ता बहिनों ने तो जोड़ना सीखा |

हिफाज़त ज़िन्दगी भर की लिया करते थे कसमें वो,
मगर कलयुग में भैया ने ये रिश्ता तोडना सीखा |

मुहब्बत से वो ज़ख्मों पर जो मरहम वो लगाती थी,
मगर नोटों से भैया ने इसे अब मोड़ना सीखा |

कभी माँ की मुहब्बत बहिन की राखी बताती थी,
न जाने क्या हुआ भैया ने रिश्ते छोड़ना सीखा |

मलामत सह के भी रिश्तों को बांधे रेशमी डोरी,
ज़हर पीकर भी रिश्तों में शहद को घोलना सीखा |


हर्ष महाजन

बहरे हज़ज़ मुसमन सालिम
1222-1222-1222-1222

Wednesday, August 10, 2016

यूँ किस्से अपने लिक्खे खूब उसने खुद सफीनों पर

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यूँ किस्से अपने लिक्खे खूब उसने खुद सफीनों पर,
मेरी इच्छा है वो गजलों में सब तब्दील हो जाएँ |

हर्ष महाजन

1222-1222-1222-1222

Saturday, July 23, 2016

कब तलक निभाओगे ये दिखावटी रिश्ते,

.....

कब तलक निभाओगे ये दिखावटी रिश्ते,
कब तलक बताओ तुम गफलत में रहोगे ।

----------------हर्ष महाजन

Saturday, July 16, 2016

गर्द ओ गुबार इतना है मुझमें कि कह न सका

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गर्द ओ गुबार इतना है मुझमें कि कह न सका,
किस्से और भी याद आये उनकेे जाने के बाद ।

-----------------हर्ष महाजन

रत्ती सा भी रब्त नहीं रहा उन दोनों में शायद

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रत्ती सा भी रब्त नहीं रहा उन दोनों में शायद,
उदास हो गया है मौसम उनके जाने के बाद ।

----------------हर्ष महाजन

Monday, June 20, 2016

तेरे मसलों में न जाने किस जगह मंजिल मिले



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तेरे मसलों में न जाने किस जगह मंजिल मिले,
इतना भी अनमोल न रखना दिल में बस रंजिश मिले |
कौन जाने किस सफ़र में कोई कब आकर मिले,
मुझको लफ़्ज़ों में यूँ रखना राग में बंदिश मिले |

हर्ष महाजन

बहरे रमल मुसम्मन महफूज़
2122-2122-2122-212
*आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे

Sunday, June 12, 2016

तेरी हर अदा, हर जनून में मुझे बेहद असर लगता है

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तेरी हर अदा, हर जनून में मुझे बेहद असर लगता है,
मगर ऐ दोस्त मुझे बस तेरी रुकस्ती से डर लगता है ।
हर्ष महाजन

ऐ सनम तुझपे इतना नूर किधर से आता है

...
ऐ सनम तुझपे इतना नूर किधर से आता है,
है फलक पर भी वो चन्दा उधर शरमाता है ।

तेरी साँसों की कसम मुझको हवाओं की कसम,
तेरे हर नक्श में हमदम सा नज़र आता है |

हर्ष महाजन