Wednesday, August 10, 2011

हम जब-जब बर्बादी-ए-दिल सुनाते रहे

_________नज़्म

हम जब-जब बर्बादी-ए-दिल सुनाते रहे
जश्न वो यूँ ही मनाते रहे |

खुशी से न मर जाएँ यही कहा उसने
फिर बे-वफाई का किस्सा फख्र से सुनाते रहे

आंसुओं से नवाज़ा उसने मुझको इस तरह
हम तब से चश्म अपने सहलाते रहे|

बातों में उसकी सियाही का ज़िक्र था
रफ्ता-रफ्ता मेरी जिंद में लगाते रहे |

_______हर्ष महाजन @