Wednesday, April 11, 2012

दर-दर भटक-भटक के जुटाई हैं रोटियाँ

दर-दर भटक-भटक के जुटाई हैं रोटियाँ
महेनत से जोड़-जोड़  कमाई है रोटियाँ

धुप में झुलसता था फिर काम के बिना
भूखी जो देखी नज़रें तो छुपाई है रोटियाँ |


मजदूर बन के ढोये थे मलबे की गोटियाँ
फिर शाम को अदब से फिर खाते थे रोटियाँ

घर आ नहीं सका था मैं त्योहारों में कभी
दिल मार , खा रहा था बासी मैं रोटियाँ ।

सड़कों पे खा रहा था सिपाही की सोटियाँ
मैं इस तरह कमा रहा दो जून की रोटियाँ ।

दर-दर भटक-भटक के जुटाई हैं रोटियाँ
महेनत से जोड़-जोड़  कमाई है रोटियाँ

____________हर्ष महाजन