Wednesday, July 11, 2012

ये कैसा कारोबार है ये कैसा कारोबार

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ये कैसा कारोबार है ये कैसा कारोबार
इश्क में नाकाम हो के रोये बार-बार ।

फूल क्यूँ खिलता नहीं मुद्दत से इंतज़ार
आस्तीनों में रखे न जाने कब से खार ।

हमें भी था ये शौक इश्क का भी लें खुमार
न जाने देखा दिल में लाखों गम के गुबार ।

फरेब है ये इश्क और इसका ये इंतज़ार,
किस पे हो इख्तियार, करें किस पे ऐतबार ।

दुश्मनों के हाथों में फूलों का गर है हार,
तो देखना 'हर्ष' कहीं न चल पड़े कटार ।

___________हर्ष महाजन