Wednesday, May 1, 2013

ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 11

शेर बनता कैसे है....रुक्न की भाषा


दोस्तों नयी सुबह का सलाम.....शुभ-प्रभात ----

एक शिक्षक के रूप मे काम  करने से मुश्किल शायद कोई काम नहीं है ...आज
लोगों की प्रतिक्रिया के रूप में केवल दो ही प्रतिक्रियाएं आयीं पिछली कक्षाओं मे जो किया ..और जो अपना सुखन बनाये रखे हैं उनके लिए ये ज़रूरी है
कि अब तक की क्लास का ओउचित्य रहे उन्हें आज की क्लास जरूरी है यहाँ कुछ साथ जैम नहीं रहा....मेरी और भी क्लासेस चल रही हैं...वहाँ और यहाँ कितना अंतर है मैं देख रहा हूँ ...आज उनके किये हुए कई सवाल आज यहाँ आपको दूंगा....जिनके जवाद भी दिए हैं हैं.....आज का आखिरी दिन आपके साथ एक शिक्षक के रूप मे | पता नहीं ..नैनी जी से सम्भोदित कर रहा हूँ कि जाने क्यूँ इसी मंच पर ऐसा क्यूँ है....मुश्किल काम और एक रेयर नोलेज कोई क्यूँ नहीं सीखना चाहेगा ? ताज्जुब है...। वेसे एक बात तो है | यहाँ ऐसे शायर हैं क्यूँ सीखना चाहेंगे...और वो भी इसलिये कि जब बिना व्याेकरण के ज्ञान के ही शायर माना जा रहा है तो फिर ज़रूरत ही क्यास व्याकरण को सीखने की ।

चलो छोडिये.....थोडा अच्छा नहीं लगा सो कह दिया.....मैं लेस्सन की और आता हूँ...अब ग़ज़ल को फिर देखते हैं...ग़ज़ल किस प्रकार अपना रूप लेती है ..ग़ज़ल कोई टाफी नहीं जो घोली .और पी गए...मैंने इतना कुछ कहा ऊपर अपने पुराने लेस्सन मे .लेकिन उन सब से आप अपने कहे गए अहसासों कि मरम्मत तो कर सकते हो...लेकिन ..उन्हें ग़ज़ल कहेंगे या नहीं....ये बहूत दूर की कौड़ी है अभी...ग़ज़ल तक जाने के लिए ये अभी नर्सरी क्लास के ही लेस्सन हैं | अभी फस्ट/सेकण्ड/थर्ड/..........एम् ए ..पी.एच.डी अभी दूर की बात है...|आइये अब थोडा अब आगे बढ़ें |

दरअसल जो भी हम कहते हैं या लिखते हैं ग़ज़ल के रूप में या कविता के रूप मे उसमें ग़ज़ल ध्वरनि का खेल है पूरी की पूरी ग़ज़ल का काम जो है वो एक वैज्ञानिक आधार पर चलता है । इसका मतलब ये है कि ग़ज़ल को ध्वननि पर रचा जाता है । उसकी आवाज़ को गुना जाता है हमारे/ आपके मुंह से निकलने वाले उच्चाभरण पर ही सारा सब कुछ मुनस्सर रहता है । हमने अपनी छोटी क्लास्सेस में छंदों का ज्ञान लिया था अगर हम उन हिंदी के छंदों की बात करें तो वहां पर मात्राओं का खेल है वहां पर उच्चाारणों का उतना महत्वि नहीं है जितना मात्राओं का है । पर ग़ज़ल तो केवल और केवल ध्व्नि पर ही चलती है । इसके बारे में बहुत से भ्रम पैदा किये हैं ...बड़े बड़े उर्दुदन इस रूप को उलझाने में लगे रहते हैं...बहुत बहस मुबैये के बाद निष्कर्ष वही ढाक के तीन पात....तो हाँ मैं कह रहा था ..ग़ज़ल केवल ध्वनि पर ही चलती है आपने क्याब उच्चाहरण किया उस पर ही सब मुनस्सर है कि मात्राएं क्या होंगी । सिर्फ गज़ल में ही ऐसा होता है कि हम मोहब्बत भी कहते हैं और हम मुहब्बत भी कहते हैं |हम दीवाना भी कहते हैं और कभी दिवाना भी कहते हैं । हम दीवार भी कहते हैं और कभी दिवार भी कहते हैं । ये जो कुछ भी हो रहा है ये केवल इसलिये हो रहा है क्योंोकि उच्चािरण की सुविधा के कारण ये है ।यहाँ हम ये कह सकते हैं कि ध्वेनि विज्ञान का एक अद्‌भुत उदाहरण है ग़ज़ल । यहाँ पर मात्राएँ आपके स्वडर से निर्धारित होती हैं । हालाँकि भारतीय हिन्दी छंद की हिसाब से यहां पर भी लघु और दीर्घ दो प्रकार की मात्राएं होती हैं पर यहां पर ये स्वेतंत्रता होती है कि आप दो लघु को मिलाकर अपनी सुविधा से उसे एक दीर्घ के रूप में ले सकते हैं ।..देखो कैसी विडम्बना है.....अब क्यूँ न ये बड़े बड़े शायर इसको मुश्किल सौदे की तरह पेश करें....कोई नया शायर इस दुनिया में आये कैसे...सब दलीले खारिज कर दी जाती हैं....हमें अपनी रचनाओं मे अहसास को मात्राओं पर कुर्बान नहीं करना है.....लेकिन उनका ध्यान आवश्य रखना है.......ये पूरी बात जो ऊपर ने कही इसको रिफरेंस के रूप में याद रखें आगे आने वाले समय में आपको बार-बार इसकी ज़रुरत होगी |
अब आज आपको ये भी बता दें कि शेर बनता कैसे है ? इस बात की और ध्यान दें....और ये रुक्न जो शेर मे होते हैं ये क्या होते हैं |
रुक्नं :- अगर हम अपने कहे अहसास को जो शे'र के रूप मे पेश करेंगे .......अगर तुम
साथ देते तो शे'र कहने की प्रेक्टिस भी इसमें शामिल थी...जो आपी चुप्पी कि वज़ह से या आपके प्रश्नों की कमी की वज़ह से ख़त्म हो गयी....तो दोस्तों चलो ये आपका धेर्य है के आप इतना ही चाहते हैं....आगे कहना चाहूँगा ...कि पूरे शेर को अगर हम एक माला मान लें उस माला में लगे हुए छोटे छोटे मोती रुक्न हैं इन रुक्नोंू से मिलकर ही शेर बनता है । अब रुक्न् पर आने से पहले हम ये जानने का प्रयास करें क‍ि रुक्नज़ पैदा कहां होता है । दरअस्लय में लघु या दीर्घ मात्राओं का एक निश्चित गुच्छां रुक्ने कहलाता है । जैसे एक पुराना गीत है

पास बैठो तबीयत बहल जायगी |
इनके अगर हम रुक्न बनाये....यानि कि अगर इनके मोती देखें....इसमें तीन जगह विश्राम आ रहा है.....

इनकी मात्राएँ देखें....
पास बै-----ठो तबी------यत बहल--- जायगी |
212---------212----------212--------212
आप अब इन्हें रुक-रुक कर के पढ़ें जहां पर मैंने डेश लगाऐं हैं वहां पर विश्राम देकर पढ़ें । आपको भी लगेगा कि हां ऐसा ही तो है विश्राम तो आ ही रहा है । ये जहां पर विश्राम आ रहा है वास्तेव में वहां पर एक रुक्नु पूरा हो रहा है ।

एक दूसरा मश'हूर गीत

मुहब्त्- की झूठी कहानी पे रोए

इसको भी अगर देखा जाए तो इसमें भी तीन जगह विश्राम आ रहा है |

मुहब्त्ब ----की झूठी----कहानी-----पे रोए ।
आप अब इन्हें भी रुक-रुक कर के पढ़ें जहां पर मैंने डेश लगाऐं हैं वेसा ही फील होगा..जैसे ऊपर हुआ है....

अब एक काम करें छोड़ दें "पास बैठो तबीयत बहल जायगी |"
या मुहब्त्ँ की झूठी कहानी पे रोए को

और ये देखें ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला ।

अब एक काम करें बार बार नीचे की पंक्तियों को पढ़ें बार बार..फिर देखें कैसा प्रतीत होता है ..इनकी ध्वनी दीजिये....जैसे कहा गया है ....

पास बै-----ठो तबी------यत बहल--- जायगी |
ललाला----ललाला----ललाला----ललाला ले सकते हैं ।

मुहब्त् ----की झूठी----कहानी-----पे रोए
ललाला----ललाला----ललाला----ललाला ले सकते हैं ।

इसको आप तब तक बार बार पढ़तें रहें जब तक आपको ये न लगने लगे कि अरे दोनों में तो ग़जब का साम्यत है । साम्यप ये है कि दोनों का वज्न एक ही है ...एक ही ले है एक ही स्वर है....सारे व्यंजन उस पर खरे उतर रहे हैं...इसलिए कहा जाता है....कुछ भी पोस्ट करने से पहले अपनी रचना को तोलना है.....हर अहसास...कविता या ग़ज़ल नहीं होता.....

वजन ?
वो क्या बला है ।

तो रुक्न से हमने क्या सीखा यह कुछ निश्चित मात्राओं का एक समूह है । और हमें ये मालूम होना चाहिए अब कि मात्राओं से मिलकर ही बनते हैं रुक्नओ और रुक्नोंं से मिलकर ही बनते हैं मिसरे और मिसरों से मिलकर ही बनते हैं शेर और शेरों से मिलकर बनती हैं ग़ज़ल । मतलब रुक्नो ग़ज़ल की सबसे छोटी इकाई मानी जा सकती है । ऊपर क्याि है ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला अब ये ललाला क्याा है ये मात्राओं का एक तय गुच्छाो है जिसमें 122 का क्रम है एक लघु फिर दो दीर्घ मात्राएं आ रहीं हैं ।
बहर :-
बहर क्या है....बड़े बड़े विद्वानों ने बहर को हऊआ बना कर रख दिया है....इसे आसान तरीके से भी पेश किया जा सकता है....क्यूँ इसे मुश्किल उर्दू के तरीके से पेश किया जाता है....ये अब सोचने की बात है....हर इंसान इसे अपने सहज भाव से पेश कर सकता है....जैसे ऊपर बताया ..ररुक्नों का एक गुच्छा जो पहले से ही निर्धारित किया हुआ है ..उसे उर्दुदानों ने बहर का नाम दे दिया है...उस बहर का कोई मतलब नहीं है..उसे बस एक नाम दे दिया गया...हमें वो नाम भी याद रखने की ज़रुरत नहीं है.....जब कोई ग़ज़लकार ग़ज़ल पेश करता है...वो गाता है...नाकि नाम बताता है .....तो आज हमने देखा "रुक्नो" का एक पूर्व निर्धारित गुच्छा ही बहर होता है । पूर्व निर्धारित का मतलब जो कि पहले से ही तय है और आप उसमें कुछ भी परिवर्तन अपनी ओर से नहीं कर सकते हैं ।
जैसे मैंने ऊपर दिया ......
ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला ये पहले से ही तय है और इसमें रुक्नों का जो घटक बना 122-122-122-122 है ये एक तय रूप है पूरी की पूरी ग़ज़ल इसी रूप पर चलेगी आप किसी शे'र में इसे बदल नहीं सकते हैं ।इसके रुक्न अगर बदलेंगे...तो संगीत मयी ले समाप्त हो जायेगी.....यही संगीतकार अपने साज़ में उठाते हैं.....वो संगीत देने से पहले पूछते हैं कि कौन सी बहर है...या खुद देख लेते हैं ... ये जो तय वियास ही बहर कहलाता है । अगर आपने किसी शे'र में विन्यांस में फेर कर दिया तो आपका शेर बेबहर हो जाता है खारिज हो जाता है । अर्थात जान लें कि पूरी की पूरी ग़ज़ल उसी बहर पर चलेगी |

अब एक गाना आवर देखिये..एक पुराना गीत है..हालांकि वो ग़ज़ल नहीं है

देखें उसी गाने का अंतरा
उसी गाने का अन्तर जो ऊपर लिखा है ....

न सोचा, न समझा, न देखा, न भाला

122-122-122-122 । ये अन्तर भी उसी बहर में है ।

पूरा का पूरा गाना ही इसी बहर में है....

तो साथियों आज की क्लास के साथ मेरा वडा आपके साथ पूरा हुआ.....

आजके बाद हम आपसे आप ही की तरह मुलाक़ात करेंगे....

एक बात ध्यान रखियेगा....जो इंसान और जो कवि..बिना सीखे....लिखने कि कोशिश करता है वो पीछे रह जाता है....
एक दरख्वास्त है आप सब जो भी यहाँ पर पढ़ रहे हैं...मेरे पास इतना वक़्त नहीं होता क मैं सबके इंतेखाब चेक करू.....जैसे आपके पास वक़्त नहीं पढने का भी.....आप भी अपनी ज़िन्स्दगी मे मसरूफ हैं...मैं भी हूँ...अपनी और भी ध्यान देना होता है...मैं अपने हिसाब से रचनाओं को पढ़ लेता हूँ.....आप ये कतई न समझें की आपकी रचनाओं को इग्नोर किया गया है...बस वक़्त कि कमी समझिये या कुछ और......क्युकी एक रचना को पढने मे ही काफी वक़्त लगता है......ये आप बाखूबी समझ सकते हैं.....|


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A.कविता का स्वरुप

1.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --१
1.a
शिल्प-ज्ञान -1 a
2.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --2 ........नज़्म और ग़ज़ल
3.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --3
4.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --4 ----कविता का श्रृंगार
5.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --५ .....दोहा क्या है ?
6.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --6
7.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --7
8.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8
9.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 9
10.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 10
12.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 12