Thursday, May 31, 2012

तांका--काश !ये दिल

तांका

काश !ये दिल
शीशे के बने होते
जब टूटते ।
खुनी खुद याँ होते
फिर थाने काँ होते ?

__हर्ष महाजन ।

याँ =यहाँ
काँ = कहाँ

चोका -उसकी चाह

चोका


उसकी चाह
मुझको ले डूबेगी
पराई है न !
किसे कहूं ये सब
कभी यूँ लगे,
सब छोड़ आएगी
मेरी खातिर !
मगर देखता हूँ ।
वो तो खुश है
अपने ही घर में
मन जले है ।
काश! वो चाहे मुझे
अपनों की तरहां !! 

__हर्ष महाजन ।

Wednesday, May 30, 2012

कब्र हुई जो रौशन

..

कब्र हुई जो रौशन

कितने ही जुर्म किये हैं मेरी तन्हा ज़िन्दगी ने
हसीनों की कब्र पे जब फ़क़त अपना नाम देखा ।

कभी अखियों की नमी में कभी दिल की उस जुबां पे
मैं हैरान हो गया जब फ़क़त अपना नाम देखा ।

मेरे इश्क में वो मुब्तिला मगर ये बात से हैराँ था
नाकामियों पे पर जब फ़क़त अपना नाम देखा ।

सुबह चांदनी में लिपटी अर्थी के संग चला मैं
वो कब्र हुई जब रौशन फ़क़त अपना नाम देखा ।

_______________हर्ष महाजन

अहसास मुझे दे दो

अहसास मुझे दे दो

मैं आज तुमसे
"तुमको" मांगता हूँ ।
तुम अपने
बस थोड़े से
वो टूटे फूटे अहसास !!
छोटे से
प्यार भरे दिल में.......
संजोकर...!!
मुझे
दे पाओगी ?

हर्ष महाजन ।

Monday, May 28, 2012

मेरी माँ बे-बाक दिल को छूने चली आयी ।

..

माँ

आज बैठे-बैठे मेरी आँखें यूँ ही भर आयीं
मेरी माँ बे-बाक दिल को छूने चली आयी ।

झंझोड़ दिया मुझको यूँ उसके मातृत्व ने
ज्यूँ आस की यादें उसकी फिर चलीं आयीं ।

याद है उसकी गोद और फिर आँचल उसका
फिर नाक से फिसलती ऐनक चली आयी ।

फेरकर मुँह हमसे यूँ ही चले जाना उसका
विरान आँखें अब यादों में फिर चली आयीं ।

कर जाता है घायल अंदाज़-ए-बेगाना उसका
लहरें आँखों के रस्ते आज फिर चली आयीं ।

इतना हुए गैर के हमें ख़्वाबों से भी दूर किया
फलक से आवाज़ उसकी फिर चली आयी ।

मुझे गिला है खुद से मेरी बेबसी का 'हर्ष'
अंतरात्मा मुझे फिर धिक्कारने चली आयी ।


__________________हर्ष महाजन ।
 

Sunday, May 27, 2012

तांका --जिंद बिखर गयी

मैं घर आया
रास लीला करने
माँ जाग गयी ।
कितने घिनौने हो
दिमाग से बौने हो ।

बौना दीमाग
कहाँ छिपाऊँ अमाँ
प्यार करूँ हूँ ।
जिंद बिखर गयी
जीते जी मर गयी

____हर्ष महाजन ।

ताँका------चोका

कवि-भाव



ताँका------चोका

ताँका

ताँका की विदा सदियों पुरानी जापानी काव्य की काव्य शैली है । इस शैली उसी तरह जाना जाता था जैसे हिन्दुस्तानी राजाओं महाराजाओं ने अपने दरबार में दरबारी या धार्मिक कलाकार गया करते थे । जापान में इसे काफी प्रसिद्धि मिली। हाइकु भी शायद इसी से निकला एक भाव ही है । इसकी संरचना 5+7+5+7+7=31वर्णों की होती है।
उस वक़्त एक कवि प्रथम 5+7+5=17 भाग की रचना करता था तो दूसरा कवि दूसरे भाग 7+7 को पूरा करता था । फिर इसी तरह पुराने तांका के 7+7 को आधार बनाकर अगली शृंखला में 5+7+5 का ये क्रम चलता,
फिर इसी के आधार पर अगले मिसरों 7+7 की रचना होती थी । इस काव्य शृंखला की गेम को रेगा भी कहा जाता था । ताँका पाँच पंक्तियों और 5+7+5+7+7= 31 वर्णों में ही कही जाती रही है । ये एक बहूत ही अछि विदा है इसमें कोई और रूल नहीं है और कोई भ्रम भी नहीं है ..पहली से आखिरी मिसरे तक इसमें कवि या कहने वाले का मन लगा रहता है इसका अर्थ भरपूर होना चाहिए ...मज़ा भी आना चाहिए ...इसकी श्रखला कितनी भी लम्बी हो सकती है ......आखिरी 7+7 मिसरे को आधार बना कर कहते जाएँ और आगे बढ़ते जाएँ...।

चोका -------

5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7+5+7 और अन्त में अगर एक ताँका जोड़ दीजिए यानी 7 वर्ण की एक और पंक्ति जोड़ दीजिए । तो ये चोका हो जाता है तांका से पहले
लम्बाई की कोई सीमा नहीं है ...

एक छोटा सा ज्ञान

हर्ष महाजन ।

Saturday, May 26, 2012

तांका -कितने घिनौने हो

तांका 

मैं घर आया
रास लीला करने
माँ जाग गयी ।
कितने घिनौने हो
दिमाग से बौने हो ।

____हर्ष महाजन ।

काश ! मैं तेरी वफ़ा का इक सहारा बन चलूँ



..

काश ! मैं तेरी वफ़ा का इक सहारा बन चलूँ ,
तू रकीबों से अलग मेरा किनारा बन चले ।
गैर मुमकिन है खुदा मुझको जुदा तुझ से करे
फिर किनारा मैं बनूँ औ तू सहारा बन चले ।


__________________हर्ष महाजन ।

करत करत अब बात के, हुआ प्यार इज्र्हार

..

करत करत अब बात के, हुआ प्यार इज्र्हार
जित संग बीती बतियाते,हुई ज़िन्द बलिहार ।

_____________हर्ष महाजन ।

हर्षा अपनी जात का एकहु ही इंसान

हर्षा अपनी जात का एकहु ही इंसान
लोगन को धत्ता कहे सुनके गुरु फर्मान ।

____________हर्ष महाजन ।

शिल्प-ज्ञान -1 a

Dosto aaadaab...aaj ek baar phir aapke saaamne ek chhota sa topic laker aya hooN wahi ek topic jise dubara ek aasaan tareeke se pesh karne ki koshish bhar ...jiske baare me baar baar kahne ki zaroorat mahsoos hoti rahi hai .....sabhi ke liye isliye kehna chahta hooN....ki man ko baar baar ek irritattion si hoti hai ke baar baar kahne ke ba-wazood bhi ...nazm/kavita ko bade aasaan samjhi jaane waali tahreer samajhte haiN .....magar aisa hai nahiN....bina usooloN me lahi jaane waali nazm ..nazm nahiN hoti ..balke wo prose ka hissa hoti hai ..jisey ham Gadhya kahte haiN...afsos hota hai......Seekhne waale ...seekhne ki ratt me ye kahte to haiN ki ham seekhna chahte haiN magar seekhne se bahoot parey haiN....maiN isey roman meiN is liye likh raha hooN ke sabhi lekhak is topic ko har channel meiN padh sake ......bahot hi chhote topic me isey ek baar phir samjhaane ki koshish....

Nazm Kya Hai?...........Ek nazer

Nazm ya kavita ,ek hi subject, ek hi soch hai jo ek hi topic pe kahi jati hai, ek nazm mein do topic kabhi nahi ho sakte...koi ek vichar ho sakta hai doosra nahi....kul milakar Nazm ek soch hai....
Nazm mein Radeef,Qafiya ya Beher ki koi pabandi nahi hoti hai, haaN Nazm ka ek lay mein hona zaroori hai...jise sabhi kahne waale nazer andaaz kar dete haiN.

Example ke tour pe.....
Faiz Ahmed Faiz ki ek Nazm hai, Zara Dhyaan se Dekhiye

Mere dil mere musaafir
huaa phir se hukm saadir
ke vatan badar ho.n ham tum
de.n galii galii sadaaye.N
kare.n ruKh nagar nagar kaa
ke suraaG koii paaye.N
kisii yaar-e-naamaabar kaa
har ek ajanabii se puuchhe.n
jo pataa thaa apane ghar kaa
sar-e-kuu-e-naashanaayaa.N
hame.n din se raat karanaa
kabhii is se baat karanaa
kabhii us se baat karanaa
tumhe.n kyaa kahuu.N ke kyaa hai
shab-e-Gam burii balaa hai
hame.n ye bhii thaa Ganimat
jo koii shumaar hotaa
hame.n kyaa buraa thaa maranaa
agar ek baar hotaa

- Faiz Ahmed Faiz

Is poori Nazm ko gaur se padhne par aapko maloom hota hai ke shuru se aakhir tak Nazm mein mahoul banaya gaya hai aur aakhir tak usey mahfooz rakha hai.....lay bhi hai our topic bhi ek hai.......achhi nazmoN ko padhne se dil me hi aisa mahoul paida hota hai......kam kahiye lekin kahiye wahi jo nazm maangti hai .......

Harash Mahajan
______________
 
नीचे के लिंक पर क्लिक कीजिये और उस पर जाइए .....

1.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --१
2.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --2 ........नज़्म और ग़ज़ल
3.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --3
4.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --4 ----कविता का श्रृंगार
5.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --५ .....दोहा क्या है ?
6.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --6
7.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --7
8.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8
9.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 9
10.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 10
11.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 11
12.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 12

Wednesday, May 23, 2012

जन्म -दिन__ तेरी उम्र आज चाँद तारों पे लिख दी है मैंने

मेरी प्यारी नन्नी सी बेटी रुपाली महाजन चावला ---------जन्मदिन की बहूत बहूत मुबारक ----
24th मई -----खुदा तुम्हे हमेशां खुशीआं दे .................


तेरी उम्र आज चाँद तारों पे  लिख दी है मैंने
तेरे जन्म-दिन पे बहारों से लिख  दी है मैंने ।

सजा ली है महफ़िल अब उन लफ़्ज़ों से मैंने
तेरी ज़िन्दगी उन सितारों से लिख दी है मैंने ।

दिन महीना और तारीख जो खुदा ने चुनी है
सब खुशीआं सब दीवारों पे लिख दी है मैंने ।

हर तमन्ना और ख्वाहिश तेरे कदम चूमे
अब हर गुंजाईश किनारों पे लिख दी है मैंने ।

मेरी हस्ती भी तुझ में इस तरह समा जाए
अब खुशीआं तेरे इशारों पे लिख दी है मैंने ।

कभी ज़िन्दगी तन्हा नज़र आये तुझे बेटा,
मम्मी-डेडी की तहरीर तारों पे लिख दी है मैंने।

खाविंद की कसम कभी भूल कर भी न खाना
ये तामील उसके अधिकारों में लिख दी है मैंने ।

ज़िन्दगी की बगिया में फूल हमेशां खिलते रहे
इक तहरीर सुनहरी अक्षरों में लिख दी है मैंने ।

"जनम दिन मुबारक हो -जनम दिन मुबारक हो "


________________हर्ष महाजन ।


वो सोचते हैं तंज़ उनका धर्म है

वो सोचते हैं तंज़ उनका धर्म है
यकीनन यही उनका कर्म है ।

वो लाये गए कुदरत की देन
खुदा ने सच ली उनकी शर्म है।

क्या कहूं उदास भी क्यूँ रहूँ
दोस्ती इतनी भी नहीं नर्म है ।

आ जाओ प्यार कर लें हम
हटा लो कोई ऐसा गर भ्रम है ।

'हर्ष' यार यारों का गमखार भी
आँखों में उसकी अब भी शर्म है ।

_________हर्ष महाजन ।

किस तरह लफ्ज़ वो जुबां पे लाया होगा

..

किस तरह लफ्ज़ वो जुबां पे लाया होगा
ख्याल जुदाई का उसको जब आया होगा ।

इस तरह टूट कर चाहा था उसने मुझको
रंजोगम आज फिर तूफां भी लाया होगा ।

हमें मालूम है उस दिल की हकीकत यारो
अब तो हर साज़ में गम का ही साया होगा ।

अश्क आँखों में भर-भर जब वो गाया होगा
उसके नगमों से फिर कहर सा छाया होगा ।

मोड़ा रुख ज़ुल्म की आंधी का उसने यारो
आज फिर 'हर्ष' ने इक ज़श्न मनाया होगा ।

______________हर्ष महाजन ।

Tuesday, May 22, 2012

आज उसने मेरी ग़ज़ल को फिर लाईक किया

..

आज उसने मेरी ग़ज़ल को फिर लाईक किया
समझ गया दिन मेरा उसने फिर बर्बाद किया ।

जिसे देख कर कभी अहसास हुआ करता था
कि उसी के दिल ने कभी मुझे था आबाद किया ।

मुसलसल उसके शब्दों से नदारद ही रहीं
वो नज्में जिनको उसके हुनर ने नाबाद किया ।

सहता रहा हूँ मैं सदमे इस तरह के बहूत
मगर इसी तरह मैंने खुद को आज़ाद किया ।


_________________हर्ष महाजन ।

परखने के दौर में उसने दिल मेरा बार बार रौंदा

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परखने के दौर में उसने दिल मेरा बार बार रौंदा
वो परखता ही रहा दिल फिर आखिरी बार कौंदा ।

_____________हर्ष महाजन ।

मोहब्बत हो रही बदनाम मेरे अफ़साने बहूत हैं

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मोहब्बत हो रही बदनाम मेरे अफ़साने बहूत हैं
तेरे इस शहर में तो अब मेरे दीवाने बहुत हैं ।

तेरी आँखों के समंदर में मिले है नशा इतना
वरना कहने को तो इस शहर में मैखाने बहुत हैं

यहाँ खिलते हुए फूलों को झड़ते देखा है हमने
इन्हें अंजाम देने को अब यहाँ बेगाने बहुत हैं ।

तेरे कूचे में आकर दिल की कश्ती डूब जाती है
ज़रा अब देखो तो हम प्यार में अनजाने बहुत हैं ।

मेरी रातें तेरी यादों से सजी रहती हैं लेकिन
मुझे डर है तो बस इन यादों के ठिकाने बहुत हैं

___________हर्ष महाजन ।

Thursday, April 15, 2010
http://harashmahajan.blogspot.in/search?q=mohabbat+ho+rahi+badnaam+

किसी शाक से उस शख्स ने जब उसे तोडा होगा

..

किसी शाक से उस शख्स ने जब उसे तोडा होगा
दर्द बन गुजरेगा, जब विरह का इक फोड़ा होगा ।

कुम्हला जायेंगे खिले हुए वो फूल उन बागानों के
जहां-जहां उस शख्स ने डालों को झंझोड़ा होगा ।

________________________हर्ष महाजन ।

Monday, May 21, 2012

है अब भी अहले-मोहब्बत कि दिल पे राज़ तेरा

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है अब भी अहले-मोहब्बत कि दिल पे राज़ तेरा
अब रौशन करेगा कण-कण खुदा ये चिराग तेरा ।

__________________हर्ष महाजन ।

ये चिराग जहां रहेगा रौशन रहे ज़माना

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ये चिराग जहां रहेगा रौशन रहे ज़माना
इस ज़िन्दगी को अब यूँ गुलशन कहे ज़माना ।

छा जाए जो माहौल पर खामोश सा अँधेरा
रौशन हुआ चिराग तो गुलबदन कहे ज़माना ।

डरता नहीं 'हर्ष' कभी बस खौफ है खुदा का
मायूस है दिल मगर अब दर्पण कहे ज़माना ।

ये ज़रूरी नहीं वफ़ा का दें जवाब हम वफ़ा से
गर बन जाएँ वो मेरे तो रौशन कहे ज़माना ।

___________हर्ष महाजन ।

Sunday, May 20, 2012

उनके सहारे हमने हर इक शाम गुजारी

..

उनके सहारे हमने हर इक शाम गुजारी
कुछ भी कहे ये ज़माना उनका नाम तारी ।

मुखालिफ दुनिया हमसे प्यार उनसे भारी
खता की सजा में हमने अपनी शाम हारी ।

यकीनन कहर इक दिन आसमां से उतरेगा,
कफन पर खुदा भी करेगा हमारा नाम जारी ।

फुर्सत मिलेगी हमको गम-ए-दौरां से कभी
यकीनन दुआ ये करेंगे हो जाए जाम खारी ।

______________हर्ष महाजन ।

Saturday, May 19, 2012

तेरे नक्श-ए-क़दम पे चलें ये मुनासिब नहीं

..

तेरे नक्श-ए-क़दम पे चलें ये मेरी तदबीर नहीं
खुश नसीबी खुदा की देन है मेरी ताबीर नहीं ।

________________हर्ष महाजन ।
तदबीर=किस्मत
ताबीर=ख्वाब 

इस प्यार के सागर में तुझ से तो 'हर्ष' अब रश्क हुआ जाता है

इस प्यार के सागर में तुझ से तो 'हर्ष' अब रश्क हुआ जाता है
इन रिश्तों में वहाँ न जोड़ लेना जहां सफ़र ख़त्म  हुआ जाता है ।

___________________________हर्ष महाजन ।

उम्र भर छुपा रहेगा गद्दार ज़रूरी तो नहीं

..

उम्र भर छुपा रहेगा गद्दार ज़रूरी तो नहीं
चेहरा होगा सर-ए-बाज़ार ज़रूरी तो नहीं ।

खाली हाथ आये थे खाली हाथ ही जायेंगे
रहेगा संग दौलत का अंबार ज़रूरी तो नहीं।

फ़ैल रही है खुशबू तेरे हुस्न-ओ-शबाब की
संभला रहेगा अब रुखसार ज़रूरी तो नहीं ।

कब तक सलामत रखेगा अपना ईमान कोई,
ईमानदारों का होगा बाज़ार ज़रूरी तो नहीं ।

नफस-नफस मेरा तेरे लबों से मुअत्तर रहे
अब जुबां से करूं इज़हार ज़रूरी तो नहीं ।

कहाँ तक करेगा बर्दाश्त 'हर्ष' तेरी बे-वफाई
कभी न चलेगी मेरी तलवार ज़रूरी तो नहीं ।

_____________हर्ष महाजन ।

नफस-नफस=सांस-सांस
मुअत्तर=भीगा हुआ

Friday, May 18, 2012

तब कितने क़र्ज़ उठाये होंगे

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तब कितने क़र्ज़ उठाये होंगे
जब तेरे ही फ़र्ज़ निभाये होंगे ।

डूबा होगा सर से पाँव तक
उन पलों में जो बिताये होंगे ।

तुझसे देख लोगों की नफरत
उसने कितने सितम ढाए होंगे ।

कितना अजब हुआ ये रिश्ता तेरा
मैंने कितने ही दोष छुपाये होंगे ।

हुआ उन ज़फाओं पे इस दर्ज़ा यकीं,
बहुत बहाने अगर-मगर लगाये होंगे  ।



______हर्ष महाजन ।

Thursday, May 17, 2012

मेरा विछोड़ा किदां ओ सह गयी

...

मेरा विछोड़ा किदां ओ सह गयी
चोटां खा के शायद ओ रह गयी
बड़ा फक्र सी मिन्नू ओदे प्यार दा
इक मिंट च ओ अलविदा कह गयी ।

____________हर्ष महाजन ।

आज मुझ से ऐसा कुछ इंतजाम हो गया

..

आज मुझ से ऐसा इंतजाम हो गया
अक्षर-अक्षर कलम का तमाम हो गया ।

दिल में उनके प्यार जो था बे-हिसाब
रफ्ता-रफ्ता दर्द उसका नाम हो गया ।

बे-वफ़ा कहूं अगर, उसकी भी हो तौहीन
कुछ इस तरह वो शख्स बे-ईमान हो गया ।

पर क्या करूँ ये दिल उस से रूठता नहीं
जो बना था गुल अब गुलफाम हो गया ।

कहूं इसे तड़प या दर्द-ए-दिल की बात
कुछ भी कहो 'हर्ष' मगर कलाम हो गया ।

_____________हर्ष महाजन ।

Wednesday, May 16, 2012

तुमने अपना के भी मुझे !!!

मैंने
अपनी तमन्नाओं को
ज़ब्त से सजाया है !!
और
तुझे पाने के लिए ..
हर सुखन अपनाया है ।
कई बार .....
ये कहने को जुबां
तरसी है ..
कि
तुमने अपना के भी
मुझे !!!
नहीं अपनाया है !!!!

__हर्ष महाजन ।

किश्तों में दोस्ती का क़र्ज़ चूका के देखना

..

किश्तों में दोस्ती का क़र्ज़ चूका के देखना
हुस्न-ओ-शबाब दिल में बिठा के देखना
हो सके तो दिल में छुपे उस राज़ को 'हर्ष'
लबों से उस कशिश को जगा के देखना ।

_______________हर्ष महाजन ।

किन वादियों में छुपे हैं तेरे अहसास बता देना

..

किन वादियों में छुपे हैं तेरे अहसास बता देना
रंगीं मिजाज़ हूँ आ जाइए मेरे पास दिखा देना ।

________________हर्ष महाजन

इस तूफ़ान को अब इस तरह न छेड़ा कीजिये

..

इस तूफ़ान को अब इस तरह न छेड़ा कीजिये
शोला बदन हूँ ये सवाल अब टेड़ा न कीजिये ।

____________________हर्ष महाज

रेज़ा-रेज़ा मेरे शक को उसने कलम की तरफ यूँ धकेल दिया

..

..

रेज़ा-रेज़ा मेरे शक को उसने कलम की तरफ यूँ धकेल दिया
उसकी तकदीर बिगड़ी थी शायद वही मेरे शेरो ने उड़ेल दिया ।

________________________हर्ष महाजन ।

उस शख्स पर मैं ऊँगली उठाना नहीं चाहता

..

उस शख्स पर मैं ऊँगली उठाना नहीं चाहता
बहूत प्यार करता हूँ नाम बताना नहीं चाहता ।

________________हर्ष महाजन ।

दिल पर आज तारिख लिख लेना

..

दिल पर आज तारिख लिख लेना
खो न जाए मेरा नाम लिख लेना ।

___________हर्ष महाजन ।

कहो न कितने शिकवे शिकायत हैं ज़िन्दगी से

..

कहो न कितने शिकवे शिकायत हैं ज़िन्दगी से
अब दिखावे की ज़िन्दगी की इबादत नहीं होती ।

_____________________हर्ष महाजन ।

तारीख हमें याद है अपने इश्क की 'हर्ष'

तारीख हमें याद है अपने इश्क की 'हर्ष'
ईमान की हम अपने तिजारत नहीं करते ।

________________हर्ष महाजन ।

तिजारत=धंधा 

तेरी महफ़िल में मेरी ग़ज़लें सारी रात चली

..

तेरी महफ़िल में मेरी ग़ज़लें सारी रात चली
फिर मेरे क़त्ल की बातें भी साथ साथ चली ।

मुझे फुर्सत कहाँ थी तेरे हसीं ख़्वाबों से' 'हर्ष',
फिर रकीबों की साजिशें भी आस पास चलीं ।
 
मर भी जाऊं तो गम नहीं पर गिला है इतना,
खुद तू साज़िश में न आती जो ख़ास ख़ास चलीं ।

मुझ को लगता है बिक गया है खुदा भी यारो
वर्ना बे-वफ़ा की खताएं क्यूँ बार बार चलीं ।


_________________हर्ष महाजन ।

Tuesday, May 15, 2012

जिधर तू चलती हवाएं भी रुख बदलती हैं

..

जिधर तू चलती हवाएं भी रुख बदलती हैं
तेरी आहट भी हो तो मेरी रूह मचलती है ।
किस्मे दम है मेरी मंजिलों पे काबिज़ हो,
तुझको काँटा लगे मेरी आह निकलती है ।
तेरे ख्यालों में ही मेरा वक़्त गुज़रता है ,
जिधर ये धुप चले उधर छाँव चलती है ।

_______________हर्ष महाजन ।

Monday, May 14, 2012

अब वो कहते हैं कि अबकी ये ग़ज़ल मेरी नहीं

..

अब वो कहते हैं कि अबकी ये ग़ज़ल मेरी नहीं
इतना जलते हैं कहें आँखों में मचल मेरी नहीं ।

जब भी सीने में कभी भड़के है शोले गम के
मुझको  पागल कहें आँहों में उगल मेरी नहीं ।


___________________हर्ष महाजन ।

जुबां खामोश है अब आँख से कैसे उतरूँ

..

जुबां खामोश है अब आँख से कैसे उतरूँ
वो शज़र ज़िन्दा नहीं शाक से कैसे उतरूँ ।

जिसके दामन में रख के सर दिन गुज़रे
फिर मैं  निगाह-ए-पाक से कैसे उतरूँ ।

________________हर्ष महाजन ।

तेरी निगाह-ए-नाज़ के प्याले हैं दस्तयाब 'हर्ष'

तेरी निगाह-ए-नाज़ के प्याले हैं दस्तयाब 'हर्ष'
तू ही बता के किसलिए इसको यूँ बे-कार करूँ ।

_________________हर्ष महाजन ।

हैराँ है ये दिल देख के दूरियां तेरी यूँ ही

..

हैराँ है ये दिल देख के दूरियां तेरी यूँ ही
खुदा ने भेजा था हमको तेरी आँखों में ।

_______________हर्ष महाजन ।

तेरी अखियों से दिल तक का सफ़र लाज़मी थी

तेरी अखियों से दिल तक का सफ़र लाज़मी था
मगर मुमकिन तो था वो दूरियां तुझ में निकलीं ।

________________________हर्ष महाजन ।

दर्द इतना है कि तेरे होने का अहसास देखूं

दर्द इतना है कि तेरे होने का अहसास देखूं
जिधर भी देखूं यहाँ तुझको आस-पास देखूं ।

______________हर्ष महाजन ।

अबकी नदिया ने है दरिया को शर्मसार किया

..

अबकी नदिया ने है दरिया को शर्मसार किया,
क्या खता उसकी जो बादल पे था ऐतबार किया ।
बे-वफाई का ज़माना है इसे कोई क्या समझे,
बादलों ने तो हर मौसम का है इंतज़ार किया ।

__________________हर्ष महाजन ।

Saturday, May 12, 2012

रतजगों से 'हर्ष' आज परेशान हो गया

______________माँ

.................एक अहसास.............

रतजगों से 'हर्ष' आज परेशान हो गया
"माँ" पे लिखा हर लफ्ज़ दीवान हो गया ।
ढूँढा किये हूँ घूंघटों में हर रूह माँ लगे ,
इक लफ्ज़ से हैवान से इंसान हो गया ।
जो लोग माँ की ममता पर भी तंज़ हैं करें
उसके प्यार से उनका भी तूफ़ान सो गया ।
याद है बचपन में माँ का गौद में उठाना
वो प्यार का अहसास अब कहाँ खो गया ।
चश्मा फिसल के नाक पर बार बार था चले
बिना किये परवाह ऊन का काम हो गया ।
जाड़े की नरम धुप में उसकी याद का स्पर्श
ना जाने कब ये शख्स बे-जान सो गया ।

_________________हर्ष महाजन ।

दोस्त बन उस शख्स ने मेरा वोट भी लिया

..

दोस्त बन उस शख्स ने मेरा वोट तक लिया
सर्दियों में उस वक़्त उसने कोट तक लिया
बेवकूफ था लुटा दिया उस शख्स पे ये सब
मेरी जायदाद थी बिकी उसका नोट तक लिया ।
वो चोर था इस बात का कोई इल्म न था मुझे
उस शख्स ने मेरे जिस्म से लंगोट तक लिया ।

_________________हर्ष महाजन

सच कहूं कहानी आज समाप्त हो गयी

..

सच कहूं कहानी आज समाप्त हो गयी
पड़ोसन भई दीवानी संग रात हो गयी
बिन पिए यूँ टल्ली उसका हुस्न देखकर
ख्वाब-गाह में तारों की बारात हो गयी ।
थर्रा गया जो खुल गयी नींद अचानक
लगा कि दरअसल सुहागरात हो गयी ।
थी हुस्न-ए-वफ़ा आघोष में तसल्ली हुई
ये हाद्सा-ए-जफा रात बे-बात हो गयी ।

__________________हर्ष महाजन ।

Friday, May 11, 2012

किस-किस से पूछूं उन पे नज़र है के नहीं है

...

किस-किस से पूछूं उन पे नज़र है के नहीं है,
देते जो घाव तुमको खबर है के नहीं है ।

महफ़िल से उनका बे-सबब उठ कर चले जाना,
देखो मेरी ग़ज़लों में असर है के नहीं है ।

छलनी हुआ है दिल मेरा कुछ रहा नहीं बाकी
अब सोचो न मुझ में ये सबर है के नहीं है |

अब रंज-ओ-गम इतना था मैंने खुदकशी चुन ली,
न सोचा समंदर में भंवर है के नहीं है ।

पशेमान था जो इश्क क्यूँ कबूल न हुआ,
अब क्या कहूं किस्मत में सहर है के नहीं है ।

___________हर्ष महाजन

...

kis-kis se poochu unpe nazar hai ke nahiN hai,
Dete jo Ghaav tumko khabar hai ke nahiN hai.

Mehfil se unka be-sabab uth kar chale janaa,
Dekho meri ghazloN meiN asar hai ke nahiN hai.

Chhalni hua hai dil mera kuchh raha nahiN baaki,
Ab socho na mujh maiN ye sabar hai ke nahiN hai.

Ab ranj-o-gam itna tha maine khudkashii chun lee,
Na socha ye samandar meiN bhanwar hai ke nahiN hai.

Pashemaan tha jo ishq kyuN qabool na hua,
Ab kya kahuN kismat maiN sehar hai ke nahiN hai.


__________________Harash Mahajan

Thursday, May 10, 2012

काश ! मुझे तू माँ कभी धोखा नहीं देती

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काश ! मुझे तू माँ कभी धोखा नहीं देती,
तेरी मैं कोख़ को शिकवों का मौका नहीं देती ।

किस नाज़ से ढूँढा था बेटी ने तेरा चोला
मगर यूँ डँस के मुझको काश तू चौंका नहीं देती ।
गिरी मैं तेरे दामन से खुदा से क्या करूँ शिकवा
भटकती हूँ मैं जन्मों से नदी नौका नहीं देती ।

इक माँ ने जब-जब कोख़ को इस तरह उजाड़ा है
स्रष्टि कहर से बचने का कोई मौका नहीं देती



____________________हर्ष महाजन ।

Wednesday, May 9, 2012

माँ तुझको देखा ही नहीं

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__________माँ

माँ तुझको देखा ही नहीं
तू दे अपना अवतार कभी
ये दुनिया अजब निराली है
करती न मुझे क्यूँ प्यार कभी --------------2

न मिलता पिता का प्यार मुझे
न मिले दुनिया का दुलार मुझे
संग ले जा मुझको तू अपने
या सपनों में दे आकार कभी ।

यूँ पल-पल टूटे दिल अपना
क्यूँ दिल की कीमत कुछ भी नहीं ,
क्या भूखे बिलखते मर जाएँ
क्यूँ खुले
न किसी का द्वार कभी ।-------------2

बस ज़ुल्मों की बरखा सहते हम,
अपनी कोई पतवार नहीं,
यूँ अश्क बहें अखियन से सदा
दामन में जो ले गमख्वार नहीं ।--------------२

माँ तुझको देखा ही नहीं
तू दे अपना अवतार कभी

________हर्ष महाजन ।


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मेरी किताब से 2005

Tuesday, May 8, 2012

इश्क कहते हैं किसे, ये बात तो अभी तक हम जानते ही न थे

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इश्क कहते हैं किसे, ये बात तो अभी तक हम जानते ही न थे
दिल के दरीचों में किस तरह दिखाया उसने ये न बता सकूंगा मैं ।

____________________________हर्ष महाजन ।

लब पे शिकवे और शिकायत तो कभी थी ही नहीं मुझे ऐ 'हर्ष'

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लब पे शिकवे और शिकायत तो कभी थी ही नहीं मुझे ऐ 'हर्ष'
खोल कर अपनी जुबां दोस्तों की अहमियत घटा न सकूंगा मैं ।

_________________________हर्ष महाजन ।

Sunday, May 6, 2012

इस तरह न किसी पे हंसा कीजिये


_________गीत

इस तरह न किसी पे  हंसा कीजिये,
जो भी हो हर किसी से वफ़ा कीजिये ।
चूड़ियाँ भी रहें अब सलामत तेरी,
ज़िन्दगी भर इसी की दुआ कीजिये ।

करते थे वो वफ़ा जो रहे हमसफ़र,
डंके की चोट पर हम देते थे खबर ।
गर हुए बे-वफ़ा वो तो क्या कीजिये
फिर मेरे दर्द-ए-दिल की दवा कीजिये ।

मुझको जीना यूँ ख़्वाबों में आता नहीं
फिर दबे पाँव आना मुझे आता नहीं,
अब हकीकत की दुनिया जिया कीजिये,
और ख़्वाबों से खुद को रिहा कीजिये ।

अब तुझे छोड़ कर मैं कहाँ जाऊं 'हर्ष'
तुझ तक आना ही मेरी ये ज़िन्द थी संघर्ष,
अब तुम कह दो मुझे झक मारा कीजिये
दिल किसी  और पे आये क्या कीजिये ।

इस तरह न किसी पे  हंसा कीजिये,
जो भी हो हर किसी से वफ़ा कीजिये ।


_____________हर्ष महाजन ।




Saturday, May 5, 2012

मैं तो तन्हाईयों का तलबगार हूँ

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मैं तो  तन्हाईयों का तलबगार हूँ 
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

था काफिर सनम वो जुदा क्या हुआ
गर हुआ भी जुदा तो जुदा क्या हुआ।
या खुदा क्या कहूं उसका ही प्यार हूँ
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

हम क्या हैं हमारी औकात है क्या ,
जो भी है 'हर्ष' का, है उसी का दिया ,
उसके गाँव औ शहर का मैं बीमार हूँ ,
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

अब ज़बीं पर भी सजदा उसी का रहे
गर मुमकिन नहीं ये तो ज़िन्द न रहे,
सर कलम भी करे और कहे यार हूँ
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

मस्जिदों में अजाँ मंदिरों में शंख-नाँ(शंख-नाद)
किस तरह पत्थरों में भरी उसने जाँ,
वो कहे मुझ में, मैं उसका अवतार हूँ ,
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।


____________हर्ष महाजन ।



ज़बीं=मस्तक

Friday, May 4, 2012

दर्ज हो चुकी है किताबों में दास्ताँ अब

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दर्ज हो चुकी है किताबों में दास्ताँ अब
किस तरह छुपाऊँ दर्दों का कारवाँ अब ।
खुद्दार हूँ मैं लेकिन आईना भी हूँ मैं तेरा
नशा चढ़ा है तेरा पर होश नहीं कहाँ अब ।

________________हर्ष महाजन ।

Thursday, May 3, 2012

मेरी ज़िन्दगी के पन्ने मेरी मैकशी में डूबे

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मेरी ज़िन्दगी के पन्ने मेरी मैकशी में डूबे
मेरी महज़बी के रिश्ते सब मैकदे में डूबे ।

________________हर्ष महाजन

कर दिया मुझे फिक्र में मुब्तिला उसने इसी बात पर

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कर दिया मुझे फिक्र में मुब्तिला उसने इसी बात पर
पीता नहीं था पर सवाल पीने का था उसकी जुबां पर ।

________________________हर्ष  महाजन ।



mubtila = involved, afflicted 

पा गया काबू मैं दिल के ख़तरात पर

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पा गया काबू मैं दिल के ख़तरात पर
जाम पे जाम जो ले रहा था रात भर ।
कैसा असर था उसका मेरे ज़हन पर
फख्र महसूस न कर तू इस खैरात पर ।

________________हर्ष महाजन ।

बे-वफाई संग मुस्कराने को हुनर का नाम न देना 'हर्ष'

बे-वफाई संग मुस्कराने को हुनर का नाम न देना 'हर्ष'
जिल्लत की ज़िन्दगी है खुदगर्जी फकत मक़सूद ही है ।

__________________________हर्ष महाजन ।

मक़सूद=मकसद

इस बे-मुरव्वत दुनिया में अब वफ़ा कहाँ से लायें ऐ 'हर्ष'

इस बे-मुरव्वत दुनिया में अब वफ़ा कहाँ से लायें ऐ 'हर्ष'
मन बेवफा तन बेवफा यहाँ तक कि हमसफ़र भी बेवफा ।

___________________________हर्ष महाजन ।

Wednesday, May 2, 2012

दिन रात उसकी याद में पीता रहा हूँ मैं

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दिन रात उसकी याद में पीता रहा हूँ मैं
इक जाम राह-ए-चश्म मिले तो कुछ और बात है ।

फ़िराक-ए-यार में पिए हैं जाम-ए-अश्क बहुत
इक जाम मिले लबों से तो कुछ और बात है ।

कब तक छुपेगा ऐब वो रकीबों के संग रही
ये सब  कहे वो झूठ तो कुछ और बात है

मैकदे में बैठ ज़ख्म सी रहा हूँ मैं
ये ज़ख्म उम्र भर मिलें तो कुछ और बात है

न देख सकूंगा हमसफ़र किसी ओर को मैं 'हर्ष'
मुझको उठा ले खुद खुदा तो कुछ और बात है ।

____________हर्ष महाजन ।


फ़िराक-ए-यार=यार की जुदाई

कितने फलसफों से मेरी ज़िन्दगी दो चार हुई है

कितने फलसफों से मेरी ज़िन्दगी दो चार हुई है
बुलंदियों में रहकर मोहब्बत फिर बीमार हुई है ।
मिलती हैं तारें फिर साज की धुन निकलती है,
फिर आग में तपकर वो ठूंठ फिर सितार हुई है ।

_____________________हर्ष महाजन ।

अह्सासे ग़ज़ल वही है जो मन की कागज़ कर दे

अह्सासे ग़ज़ल वही है जो मन की कागज़ कर दे
गजनबी हो या ख्याली उन सब में नजाकत भर दे ।

____________________हर्ष महाजन ।

Tuesday, May 1, 2012

मेरे आने का उसे अहसास होने लगा है

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मेरे आने का उसे अहसास होने लगा है
बे-हिसाब वो जाम पे जाम पीने लगा है ।

पूरा वक़्त वो मैकदे में बर्बाद करता है
ऐसी ज़िन्दगी अब आम जीने लगा है।

साकी भी उसके नाम पर जाम भरता है
कैसे कहूं होके वो बदनाम जीने लगा है ।

रूठ चुकी हैं खुशीआं उसके दामन से अब
ले लेकर खुद से इंतकाम जीने लगा है ।

कैसे कहेगा 'हर्ष' तू लौट चल मैकदे से,
वो खुद भी उसके संग जाम पीने लगा है ।

___________हर्ष महाजन ।

कितना तलख तंज़ दिया उसने आज

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कितना तलख तंज़ दिया उसने आज
मेरी ग़ज़ल पर दंग किया उसने आज।

कब तक निकलेगी आँहे मेरे मिसरों पे
उसकी बहर को भंग किया उसने आज।

बदली है न बदलेगी उसकी आदत अब,
खुद को अकल-मंद किया उसने आज ।

दर्द मेरे शब्दों को भी होने लगा है अब,
उनको भी ना-पसंद किया उसने आज ।

क्यूँ छूने लगीं बुलंदी को ये ग़ज़लें 'हर्ष',
इस सवाल पर जंग किया उसने आज ।

_________हर्ष महाजन ।

सवाल नहीं बड़ा मगर मन का सवाल है

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सवाल नहीं बड़ा मगर मन का सवाल है
हर जाम में दर-असल साकी बवाल है
गर हो सके तो 'हर्ष' मेरे संग आ के पी
किसका नहीं है दिल रूझा मेरा ख्याल है ।

_______________हर्ष महाजन ।

बे-वफाओं की जफ़ाओं से घबरा के पी गया

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बे-वफाओं की जफ़ाओं से घबरा के पी गया
बद से बड़ा जो ख्याल था ठुकरा के पी गया
इस मैकदे में 'हर्ष' कभी बहका नहीं था पर
बोतल भरी शराब की बल खा के पी गया ।

_____________हर्ष महाजन ।

कितना असर है उन ग़ज़लों का मेरी ज़िन्दगी में 'हर्ष'

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कितना असर है उन ग़ज़लों का मेरी ज़िन्दगी में 'हर्ष'
के मैकदे में उनका असर मेरे हर जाम में नज़र आता है ।

__________________________हर्ष महाजन ।

ज़ख्मों की टीस लिए जीये जा रहा हूँ मैं

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ज़ख्मों की टीस लिए जीये जा रहा हूँ मैं
ख्याल बहक न जाएँ पीये जा रहा हूँ मैं ।

_______________हर्ष महाजन